बुधवार, 25 अक्टूबर 2023

पाठ्यक्रम-विभाजन तथा शिक्षक-डायरी

 

पाठ्यक्रम-विभाजन तथा शिक्षक-डायरी

(Split up sallybus and teacher diary)

 किसी भी काम को करने से पहले यदि उसकी अच्छी तरह से प्लानिंग कर ली जाये तो सफलता काफी हद तक सुनिश्चित हो जाती है | शिक्षण जैसे जीवन्त पेशे में नियोजन और भी ज़रूरी हो जाता है क्योंकि यहाँ शिक्षक का काम तमाम विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़ा हुआ है | बिना किसी तैयारी और के किया गया अध्यापन सिर्फ खानापूरी भर रह जाता है जिससे अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाते | पाठ्यक्रम विभाजन तथा शिक्षक-डायरी बनाना इसी प्लानिंग का महत्त्वपूर्ण हिस्सा  हैं |

अध्यापक को अपने विषय की पाठ्यपुस्तक को अकादमिक सत्र के दौरान न केवल पढ़ाकर खत्म करना रहता है बल्कि परीक्षा की दृष्टि से विद्यार्थियों की अपेक्षित तैयारी भी करवानी रहती है | बिना प्लानिंग के अध्यापन करते जाने पर इस बात की आशंका ज़्यादा रहती है कि पाठ्यक्रम समय पर पूरा नहीं हो पाता | परीक्षाएँ करीब आ जाती हैं और कई चैप्टर पढ़ाये जाने को रह जाते हैं | फिर अध्यापक जल्दी-जल्दी चैप्टर खत्म करने में जुटता है परिणामतः विद्यार्थी को कुछ समझ में आता है , कुछ समझ में नहीं आता | उसकी शंकाओं का निराकरण नहीं हो पाता | अंत समय तक पाठ्यक्रम पूरा करने के दबाव में अध्यापक इस ओर ध्यान ही नहीं दे पाते कि विद्यार्थी पढ़ाये गए पाठ को सही तरह से आत्मसात कर रहा है या नहीं | अध्यापक के पास समय नहीं रहता कि वह विद्यार्थियों से पाठ से संबन्धित रचनात्मक गतिविधियां करवा सके जिससे विद्यार्थियों का अधिगम रोचक हो सके | इस तरह टीचिंग-लर्निंग प्रोसेज एक उबाऊ और कामचलाऊ प्रक्रिया बन कर रह जाता है |

अध्यापक को अपने विषय की पाठ्यपुस्तक के चैपटर्स को शिक्षण-सत्र के अलग-अलग महीनों में विभाजित कर लेना चाहिए अर्थात शिक्षण-सत्र के प्रारम्भ में ही उसे यह निर्धारित कर लेना चाहिए कि उसे किस महीने में कौन-कौन से चैप्टर पढ़ाने हैं | सामान्यतः सभी शिक्षा बोर्ड में शिक्षण-सत्र अप्रैल माह से शुरू होता है और मार्च माह में खत्म होता है | मार्च माह में वार्षिक परीक्षाएँ सम्पन्न होती हैं | आजकल सीबीएसई सहित कुच्छ अन्य राज्यों के शिक्षा-बोर्ड की वार्षिक परीक्षाएँ फरवरी माह में ही शुरू हो जा रही हैं | कुछ संस्थानों में बोर्ड परीक्षाओं / वार्षिक परीक्षाओं से पूर्व प्री बोर्ड तथा पी एनुअल परीक्षाएँ भी होती हैं | इसलिए बेहतर होगा कि अध्यापक बोर्ड कक्षाओं के लिए पाठ्यक्रम विभाजन अप्रैल से नवंबर तक के महीनों में करें तथा नॉनबोर्ड कक्षाओं का पाठ्यक्रम विभाजन अप्रैल से दिसंबर तक करें ताकि विद्यार्थी के पास सेलेबस खत्म हो जाने के बाद रिवीजन और परीक्षा की तैयारी के लिए पर्याप्त समय बचे |

पाठ्यक्रम विभाजन का आधार कार्य-दिवस होता है | अध्यापक देख लें कि किस महीने में कितनी छुट्टियाँ पड़ रही हैं और कुल कितने कार्य-दिवस बच रहे हैं | इस आधार पर आकलन करें कि उतने कार्य-दिवस में कितने चैपटर्स अच्छी तरह पढ़ाये जा सकते हैं | इस तरह सत्रारंभ में ही अलग-अलग महीने में पढ़ाये जाने वाले चैप्टर्स की सारिणी बनाकर पाठ्यक्रम विभाजन करना है | पाठ्यक्रम विभाजन वास्तव में शिक्षण-सत्र के हर महीने में अध्यापक द्वारा पहले से ही अपने लिए लक्ष्य निर्धारित करना है | जब लक्ष्य का निर्धारण और उसे हासिल करने का संकल्प यात्रा से पूर्व ही कर लिया जाये तो लक्ष्य को हासिल करना आसान हो जाता है | अगर किसी महीने में किसी आकस्मिक कारण से उस महीने के लिए निर्धारित चैप्टर्स में से कोई चैप्टर पढ़ाये जाने से रह जाता है तो अध्यापक पर अगले महीने में निर्धारित चैप्टर्स के अलावा इस छूटे हुये चैप्टर को भी पढ़ाने की ज़िम्मेदारी रहती है | इस तरह पूरे सत्र में शिक्षण की गति का संतुलन बना रहता है और अध्यापक सभी चैप्टर्स समान गति , रुचि व प्रभाव से पढ़ाता है | शिक्षक साथियों की सुविधा के लिए पाठ्यक्रम विभाजन का नमूना प्रारूप यहाँ प्रस्तुत है

विषय-हिन्दी                                                      कक्षा- दसवीं (बी कोर्स)

माह

कार्य-दिवस

कालांश 

पाठ का नाम

परियोजना कार्य / क्रिया कलाप

परीक्षाएँ

अप्रैल

25

25

 

 

 

जुलाई

26

26

 

 

आवधिक परीक्षा -1

अगस्त

27

27

 

 

आवधिक परीक्षा-2

सितंबर

26

26

 

 

 

अक्तूबर

17

17

 

 

सत्रांत परीक्षा-1 / अर्धवार्षिक परीक्षा

नवंबर

12

12

 

 

 

दिसंबर

26

26

पुनरावर्तन

 

प्री बोर्ड-1

जनवरी

20

20

पुनरावर्तन

 

प्री बोर्ड-2

फरवरी

25

25

पुनरावर्तन

 

 

मार्च

26

26

पुनरावर्तन

 

वार्षिक परीक्षा

  ये नमूना प्रारूप शिक्षक साथियों की सुविधा के लिए है | कक्षा , विषय तथा स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप प्रारूप में थोड़ा बहुत फेरबदल किया जा सकता है | मुख्य मुद्दा है अग्रिम लक्ष्य निर्धारण |

प्लानिंग का दूसरा हिस्सा है टीचर-डायरी | अध्यापक को अग्रिम पाक्षिक डायरी बनानी चाहिए | आशय यह है कि पाठ्यक्रम विभाजन के तहत किसी महीने में किसी कक्षा में पढ़ाये जाने के लिए जीतने चैप्टर्स निर्धारित किए गए हैं , उन्हें भी कार्य-दिवस को ध्यान में रखते हुये 15-15 दिन के दो भागों में विभाजित कर लेना चाहिए | अब इन पंद्रह दिनों में जो-जो पाठ पढ़ाये जाने हैं उनके उद्देश्य (objectives) क्या हैं , उन्हें पढ़ाने के लिए किस-किस प्रविधि (methodology) का इस्तेमाल किया जाएगा , उन्हें पढ़ाने के दौरान किस-किस तरह की सहायक सामग्री (teaching aids) का प्रयोग किया जाएगा , उन पाठों को पढ़ाये जाने के बाद विद्यार्थियों को कौन-कौन से कार्य करने के लिए दिये जाएँगे , पाठ के आधार पर कौन-कौन-सी रचनात्मक गतिविधियां कारवाई जाएंगी तथा पाठ की समझ को विस्तार देने के लिए विद्यार्थी को पाठ से इतर अन्य कौन-कौन-सी सामग्री को पढ़ने का सुझाव दिया जाएगा ? इन सभी सवालों का जवाब अध्यापक को एडवांस में अपनी डायरी में लिख लेना चाहिए | ऐसा करने से शिक्षण के दौरान अध्यापक के सामने भी अपना उद्देश्य बिलकुल स्पष्ट रहता है | विषय से भटकाव की संभावना लगभग समाप्त हो जाती है | गुणवत्तापरक शिक्षण के साथ समय पर पाठ्यक्रम पूरा करने की दिशा में डायरी बनाना बहुत लाभकारी होता है | आजकल कुछ प्रकाशक  टीचर-डायरी छापते हैं |विद्यालयों को ये डायरी मंगाकर अध्यापकों को उपलब्ध करानी चाहिए | ऐसा न हो सके तो अध्यापकों को अपने स्तर पर ही सादे नोट बुक में अपनी टीचर डायरी बनानी चाहिए | उदाहरण के लिए पाक्षिक टीचर डायरी का एक प्रारूप यहाँ प्रस्तुत है

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LESSON NOTE

SUBJECT..........................        CLASS ................................ SECTION.....................

1-Syllabus to be covered in one fortnight from ..................... ..to ..............................

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2-Instructional Objective

(i)       .............................................................................................................................

(ii)      .............................................................................................................................

(iii)      .............................................................................................................................

(iv)      .............................................................................................................................

(v)      .............................................................................................................................

3-Teaching aids to be used

(i)       .............................................................................................................................

(ii)      .............................................................................................................................

(iii)      .............................................................................................................................

(iv)      .............................................................................................................................

(v)      .............................................................................................................................

4-Innovative practices to be used

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5-Activity/Project to be used

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6-Assignment Home Work to be give

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7-Expected behavioural outcomes

(i)       .............................................................................................................................

(ii)      .............................................................................................................................

(iii)      .............................................................................................................................

(iv)      .............................................................................................................................

(v)      .............................................................................................................................

8-Method of Evaluation of the topics to be covered

(i)       .............................................................................................................................

(ii)      .............................................................................................................................

(iii)      .............................................................................................................................

(iv)      .............................................................................................................................

9- Portion assigned in the previous fortnight is completed/not completed

(i)       .............................................................................................................................

(ii)      .............................................................................................................................

(iii)      .............................................................................................................................

10- What steps are you taking to complete unfinished portion of the previous fortnight with the portion of the next fortnight planning .

(i)       .............................................................................................................................

(ii)      .............................................................................................................................

(iii)      .............................................................................................................................

 

Sign. Of teacher                                                 Sign of Principal

Date ....................

..............................................................................................................................................

नियोजन का ही एक हिस्सा है पाठ-योजना तैयार करना | बीएड , बीटीसी की ट्रेनिंग के दौरान हर शिक्षक ने पाठ-योजना की होगी | दुर्भाग्यपूर्ण है कि ट्रेनिंग के उपरांत नामिका निरीक्षण (panel inspection) को छोडकर शायद ही कोई अध्यापक कभी पाठ-योजना तैयार करता हो | जैसा की पहले ही नियोजन के महत्त्व पर प्रकाश डाला जा चुका है तो अध्यापकों से मैं यह उम्मीद करता हूँ कि हर पाठ की पाठ-योजना जरूर बनानी चाहिए | राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के अनुरूप अब नए तरीके से योग्यता आधारित पाठ-योजना (Competency Based Lesson Plan) बनाया जाने लगा है तो यहाँ यहाँ योग्यता आधारित पाठ-योजना का एक नमूना प्रारूप आपके सामने प्रस्तुत किए दे रहा हूँ |

 

 

 

Competency Based Lesson/ Unit Plan

 

 Name of the Teacher :                             Designation:

 Subject:                                           Class:                                 Section:

 Lesson / Unit Name:

 Number of periods required:          Duration :  From……………….. To……………...

 

  

A.           Learning Outcomes   (Specific to the lesson map with NCERT Learning outcomes) :

  

1).

 

2).

 

3).

 

4).

 

5).

 

6).

 

 

B). Details of Pedagogical Strategies Process ( Art- Integrated /Sports- Integrated/ Story-Telling Based /Toy-Based /Any other Pedagogy:

 

 

 

 

 

 

C). Topic of the lesson for  presentation by the students( once in a week by rearranging   classroom setting suitable for group):

 

 

 

 

 

 

D).  Name of 21st century skills to be developed:

 

 

 

 

 

 

E). Activities/Experiments/Hands-on-learning/Project:

 

 

 

 

 

 

 

F). Interdisciplinary linkage and infusion of Life Skills,Values, Gender Sensitivity and Environmental Awareness:

 

G). Resources (including ICT):

 

H).Assessment items for measuring the attainment of learning outcomes in the class and as home assignments: 

ITEMS

No. of Items

S.NO. of LO

ITEMS

No. of Items

S.NO. of LO

Oral Quiz

Presentation

Portfolio

Puzzle

M C Qs

Group Project

VSAQs

Individual Project

SAQs

LAQs

CBQs

I).Remedial Teaching Plans/  Plan for unfinished portion of previous unit:

 

J).Inclusive Practices  (Activities / Support measures for Differently abled students):



   Date:                                                                                                                                            

 

Remarks of the Principal:

                                                                                           

                                                                                                        

Signature of the Teacher                                                             Signature of the Principal         

        

 

 

 

 

सहायक-सामग्री

 

सहायक-सामग्री

(Teaching aids)

बी॰ एड॰ प्रशिक्षण को छोडकर अधिकांश शिक्षक नामिका निरीक्षण (panel inspection ) या फिर किन्हीं विशेष अवसरों पर ही सहायक सामग्री का प्रयोग करते हैं | नामिका निरीक्षण , जांच इत्यादि के प्रावधान भी सरकारी विद्यालयों में हैं , निजी विद्यालयों में तो वह भी नहीं है | निजी विद्यालयों में बहुतेरे शिक्षकों ने बीएड भी नहीं किया होता तो इन अध्यापकों को बीएड प्रशिक्षण के दौरान प्रेक्टिस टीचिंग में सहायक सामग्री के इस्तेमाल का अवसर भी नहीं मिला होता | सच तो यह है कि हमारे अधिकांश शिक्षकों को सहायक सामग्रियों के प्रयोग का महत्त्व पता ही नहीं है | आजकल निजी महाविद्यालयों में जिस प्रकार बी एड , बीटीसी के प्रशिक्षण संचालित होते हैं उनकी सच्चाई से हम सभी परिचित हैं | इसके विस्तार में जाने की आवश्यकता नहीं है | वास्तव में शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया के सबसे महत्त्वपूर्ण , सबसे जीवंत संसाधन की उपेक्षा होती है | वहीं मेरे सामने कई उदाहरण ऐसे शिक्षकों के भी हैं , जिन्होने सहायक सामाग्री का नवाचारी व रचनात्मक प्रयोग करके न केवल अपने अध्यापन को आकर्षक व प्रभावी बनाया बल्कि अपेक्षित परिणाम भी हासिल किए | मेरे गुजरात पोस्टिंग के दौरान एक सहकर्मी डॉ॰ रवीन्द्र प्रसाद ओझा जी प्रत्येक कक्षा में सहायक सामग्री के साथ ही जाते थे | मुझे याद है NCERT की कक्षा -  की हिन्दी की पाठ्य पुस्तक के एक पाठ में बढ़ईगिरी से संबन्धित तमाम औजारों का ज़िक्र है | तो रवीन्द्र प्रसाद जी नजदीकी बाज़ार के एक बढ़ई के पास गए और उससे काफी मिन्नतें करके , कुछ पैसे भी देकर उसके तमाम औज़ार एक दिन के लिए मांग लाये | वे उस पाठ को पढ़ाते समय वो सारे औज़ार जैसे- रंदा , आरी इत्यादि कक्षा में लेकर गए | उन्होने उन औजारों का नाम बताते हुये उन्हें विद्यार्थियों को दिखाया तथा उनके काम करने का तरीका भी समझाया | अब आप उस कक्षा में विद्यार्थियों की रुचि और उनके अधिगम का अनुमान स्वतः लगा सकते हैं | रवीन्द्र जी अपने विद्यालय के सबसे लोकप्रिय शिक्षक हैं | विद्यार्थी उनकी कक्षा कभी नहीं छोडते | | अतः कह सकते हैं कि वही शिक्षक विद्यार्थियों के लिए आदर्श होता है और उसका शिक्षण आदर्श शिक्षण कहलाता है जो अपनी पाठ्य-सामाग्री को रोचक सहायक सामग्री के साथ प्रस्तुत करता है | क्योंकि ये न केवल विद्यार्थियों का ध्यान खींचती हैं बल्कि उन्हें उचित प्रेरणा भी देती हैं |

शिक्षाशास्त्री देण्ड के अनुसार – सहायक सामग्री वह सामग्री है जो कक्षा या अन्य शिक्षण परिस्थितियों में लिखित या बोली गई पाठ्य सामग्री को समझने में सहायता प्रदान करती हैं |

शिक्षाशास्त्री कार्टर ए गुड के अनुसार – कोई भी ऐसी सामग्री जिसके माध्यम से शिक्षण प्रक्रिया को उदीप्त किया जा सके , अथवा श्रवणेंद्रीय संवेदनाओं के द्वारा आगे बढ़ाया जा सके वह सहायक सामग्री है |

उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि सहायक सामग्री वह सामग्री , उपकरण तथा युक्तियाँ हैं जिनके प्रयोग करने से विभिन्न शिक्षण परिस्थितियों में विद्यार्थियों और समूहों के मध्य प्रभावशाली ढंग से ज्ञान का संचार होता हो |

सहायक सामग्री के प्रकार - सहायक सामग्री कई तरह की हो सकती हैं | शिक्षक अपने पाठ्य सामग्री की आवश्यकता के अनुरूप तथा अपनी रचनात्मक समझ के अनुरूप किसी भी वस्तु को सहायक सामग्री के रूप भी प्रयुक्त कर सकता है | मुख्य रूप से सहायक सामग्री के निम्नलिखित प्रकार हो सकते हैं

1-  श्रव्य सहायक सामग्री – इसके अंतर्गत मौखिक उदाहरण , रेडियो , टेपरिकार्डर , ग्रामोफोन इत्यादि को रखा जा सकता है |

2-   दृश्य सहायक सामग्री – श्यामपट , बुलेटिन बोर्ड , , फ्लेनिल बोर्ड , मानचित्र , ग्लोब , चित्र , रेखाचित्र , कार्टून , माडल , पोस्टर , कैलेंडर , स्लाइड्स , पुस्तक , पत्रिका ,  फिल्म स्ट्रिप्स आदि को दृश्य सहायक सामग्री के अंतर्गत सम्मिलित किया जाता है |  

3-  श्रव्य-दृश्य सहायक सामग्री – इसका आशय है ऐसी सहायक सामग्री जिसे देखा भी जाये और सुना भी जाये | इसके अंतर्गत चलचित्र , नाटक , कठपुतली , टेलीविज़न , एंडरायड मोबाइल फोन , इन्टरनेट पर उपलब्ध सामग्री आदि को सम्मिलित किया जा सकता है |

सहायक सामग्री का महत्त्व – सहायक सामग्री के महत्त्व को निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर निरूपित किया जा सकता है –

1-   सहायक सामग्री विषय को स्थायी रूप से सीखने व समझने में सहायक होती है |

2-   जहां शिक्षक का मौखिक वक्तव्य कम प्रभाव उत्पन्न करता है वहीं दृश्य सामग्री पाठ को रोचकता प्रदान कर उसे बोधगम्य बनाती है |

3-  यह अनुभवों के द्वारा ज्ञान प्रदान करती है |

4-  यह शिक्षक के समय व ऊर्जा की बचत करती है |

5-  यह विचारों को प्रवाहात्मकता प्रदान करती है |

6-   भाषा संबंधी कठिनाइयों को दूर करती है |

7-   अध्यापन रुचिकर रहने से विद्यार्थी अधिक सक्रिय रहते हैं |

8-  विद्यार्थी अनुसंधान व परियोजना में  बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते हैं |

9-  वस्तुओं को प्रत्यक्ष देखने , छूने , महसूस करने का अवसर मिलता है |

10-  विद्यार्थी प्राकृतिक व कृतिम वस्तुओं के तुलनात्मक भेद को समझ पाते हैं |

सहायक सामग्री के उद्देश्य – सहायक सामग्री का उपयोग निम्नलिखित उद्देश्य प्राप्ति के लिए किया जाता है –

1-  विद्यार्थियों में पाठ के प्रति रुचि जागृत करना |

2-  विद्यार्थियों के सम्मुख तथ्यात्मक सूचनाओं को रोचक ढंग से प्रस्तुत करना |

3-  सीखने की गति में सुधार करना |

4-  विद्यार्थियों को अधिक क्रियाशील बनाना |

5-  अभिरुचियों पर आशानुकूल प्रभाव डालना |

6-  तीव्र एवं मंद बुद्धि के विद्यार्थियों को योग्यतानुसार शिक्षा देना |

7-  जटिल विषयों को भी सरस रूप में प्रस्तुत करना |

8-  विद्यार्थी का ध्यान पाठ की ओर केन्द्रित करना |

9-  अमूर्त प्रदार्थों को भी मूर्त रूप में प्रस्तुत करना |

10-  विद्यार्थियों की निरीक्षण शक्ति का विकास करना |

सहायक सामग्री के कार्य – सहायक सामग्री शिक्षण व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण अंग है | इसके इसी महत्त्व को दृष्टि में रखते हुये सभी शिक्षाशास्त्रियों ने एकमत से इसे स्वीकार किया है | शिक्षण व्यवस्था में सहायक सामग्री जिन दायित्वों का निर्वहन करती है , वे निम्नलिखित हैं –

1-  प्रेरणा – सहायक सामग्री के माध्यम से सीखे हुये ज्ञान से विद्यार्थियों में उत्सुकता जागती है और सीखा हुआ ज्ञान उन्हें आगे और सीखने के लिए प्रेरणा देता है |

2-  क्रिया का सिद्धान्त – इन सामग्रियों के माध्यम से विद्यार्थियों को विविध प्रकार की क्रियाओं को करने का अवसर मिलता है | वे खेल-खेल में ही जटिल पाठ्यक्रम को भी आसानी से सीख लेते हैं |

3-  स्पष्टीकरण – सहायक सामाग्री के प्रयोग से जटिल से जटिल पाठ्यवस्तु को प्रत्यक्ष देखकर विद्यार्थियों के मन में उठी शंकाओं का समाधान हो जाता है |

4-  अनुभवयुक्त शिक्षण – कहते हैं रटे हुये ज्ञान से सीखा हुआ ज्ञान ज्यादा प्रभावशाली होता है और यह लंबे समय तक याद रहता है | इससे विद्यार्थियों के मौखिक चिंतन को भी प्रोत्साहन मिलता है |

5-  शब्दकोश में वृद्धि – सहायक सामग्रियाँ विद्यार्थियों के शब्द भंडार में वृद्धि करती हैं | इसके साथ ही उनका अभिव्यक्ति कौशल भी सुदृढ़ होता है |

6-  शिक्षण में कुशलता – ये सामग्रियाँ शिक्षक को उसकी अध्यापन प्रक्रिया में काफी मदद करती हैं | शिक्षक अपने विषय को बेहतर ढंग से प्रस्तुत कर पाता है | 

सहायक सामग्री का प्रयोग करते समय ध्यान देने योग्य बातें – सहायक सामग्री का प्रयोग करते समय शिक्षक को निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए –

1-  ये सामग्रियाँ विद्यार्थियों के अनुभव , समझ और आयु के अनुसार होनी चाहिए |

2-  सामग्री पाठ्यवस्तु से संबन्धित होनी चाहिए |

3-  सामग्री का चयन करते समय ध्यान रखा जाना चाहिए कि ये विद्यार्थियों की रुचि जागृत करने वाली हों |

4-  अनावश्यक सहायक सामग्री का प्रयोग नहीं करना चाहिए |

5-  सहायक सामग्री का  जितनी देर आवश्यक हो उतनी देर ही प्रयोग करना चाहिए |

6-  सामग्री यदि नवाचार से जुड़ी व तकनीक से संबन्धित हो तो प्रयास होना चाहिए कि इस सामग्री का संचालन सरल हो |

7-  जो सामग्री प्रयुक्त की जा रही हो उसे सही हालत में होना चाहिए |

8-  उपयोग से पूर्व शिक्षक को उस सामग्री का एक बार इस्तेमाल करके उसकी जांच एवं अभ्यास कर लेना चाहिए |

9-  सहायक सामग्री के प्रभावशाली उपयोग के बारे में समस्त निर्देश सावधानी  और ध्यान पूर्वक पहले पढ़ लेना चाहिए |

10-  प्रयोग के तुरंत बाद सामग्री को विद्यार्थियों के सामने से हटा देना चाहिए | ( संदर्भ : www.tetsuccesskey.com )

ब्लैक बोर्ड / व्हाइट बोर्ड / डिजिटल बोर्ड

 

ब्लैक बोर्ड / व्हाइट बोर्ड / डिजिटल बोर्ड

माध्यमिक स्तर पर शिक्षण की व्याख्यान शैली (lecture method) को शिक्षाविदों द्वारा बहुत उपयुक्त नहीं माना जाता | हांलाकि उच्च शिक्षा में अधिकांशतः इसी व्याख्यान शैली का प्रयोग अध्यापकों के द्वारा किया जाता है | माध्यमिक स्तर पर व्याख्यान शैली बहुत प्रभावी नहीं होती है | इस स्तर के विद्यार्थी किशोर होते हैं , जिनमें सिर्फ सुनकर विषय की समझ विकसित करने की परिपक्वता नहीं आई होती | मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि सुनी गई से ज्यादा देखी गई और देखी गई से ज्यादा लिखी गई बात का प्रभाव मस्तिष्क पटल पर अधिक स्थायी होता है | इसलिए शिक्षक को अपने शिक्षण में अधिकाधिक श्याम पट (black board ) का इस्तेमाल करना चाहिए | आधुनिकीकरण के चलते आजकल श्याम पट की जगह श्वेत पट ( white board ) का इस्तेमाल होने लगा है | श्वेत पट पर चॉक की जगह रिमूवेबल मार्कर पेन ने ले लिया है | चूंकि श्याम पट और श्वेत पट को आम बोलचाल में ब्लैक बोर्ड और व्हाइट बोर्ड ही पुकारा जाता है तो आगे के विश्लेषण में हम भी इसी का इस्तेमाल करेंगे | शिक्षण प्रक्रिया में ब्लैक बोर्ड / व्हाइट बोर्ड का विशेष महत्त्व है | कक्षा में ब्लैक बोर्ड / व्हाइट बोर्ड अध्यापक का मित्र होता है | शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को सही , प्रभावपूर्ण , समुन्नत बनाने के लिए अध्यापक अनेक प्रकार से स्वकौशल का प्रदर्शन ब्लैक बोर्ड / व्हाइट बोर्ड पर करता है | उदाहरण के लिए कार्टून , चित्र , ग्राफ , समय-सारिणी आदि का ब्लैक बोर्ड / व्हाइट बोर्ड के माध्यम से विद्यार्थियों को अवगत कराना | एक कुशल शिक्षक पाठ के महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं को ब्लैक बोर्ड / व्हाइट बोर्ड पर लिखना नहीं भूलता |

 ब्लैक बोर्ड / व्हाइट बोर्ड का इस्तेमाल करने से शिक्षण में वस्तुनिष्ठता आती है | मुद्दे से भटकाव की संभावना कम होती है | गणित जैसे विषय अपनी प्रकृति मे ही वस्तुनिष्ठ होते हैं वहाँ इकवेशन , कैलकुलेशन , समीकरण , चित्रा , ग्राफ आदि लिखकर , बनाकर प्रकरण को स्पष्ट करने की अनिवार्यतः रहती है , किन्तु मानविकी के विषयों मे अध्यापन के आत्मनिष्ठ हो जाने की संभावना अधिक रहती है | चर्चा कहीं से शुरू होकर कहीं पहुँच जाती है | ऐसे में यदि शिक्षक के व्याख्यान की प्रस्तुति आकर्षक नहीं हुई तो विद्यार्थियों के अधिगम की दृष्टि से निष्प्रभावी हो जाती है | कई बार आकर्षक व्याख्यान भी विद्यार्थियों के लिए रंजक तो होता है , किन्तु अधिगम स्थायी नहीं हो पाता है | सुनी गई बातों में से अधिकांशतः कक्षा के उपरांत स्मृति से गायब हो जाती हैं | वहीं जब अध्यापक पाठ के ज़रूरी तथ्यों और महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं को ब्लैक बोर्ड / व्हाइट बोर्ड पर लिखकर उनका विश्लेषण करता है तो वे बातें विद्यार्थी के मस्तिष्क मे स्थायी तौर पर फीड हो जाती हैं | अध्यापक उन बिन्दुओं और तथ्यों को नोटबुक में उतारने का निर्देश देता है | विद्यार्थी जिंका बाद में रिवीजन भी करता है | उन तथ्यों और बिन्दुओं की मदद से प्रश्नों के उत्तर लिखता है | इस प्रकार तथ्यों , महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं को बार-बार देखने-पढ़ने से अधिगम मजबूत होता चला जाता है | महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर नज़र पड़ते ही दिमाग में पूरे पाठ की पुनरावृत्ति हो जाती है | इस तरह सुनना , देखना और लिखना तीनों मिलकर उसके अधिगम को पुष्ट कर देते हैं | जैसा कि कहा जा चुका है कि ब्लैक बोर्ड / व्हाइट बोर्ड का प्रयोग अध्यापक को मुद्दे से भटकने से रोकता है तो यह अध्यापक के लिए कालांश की निर्धारित अवधि मेन अपने लक्षित प्रकरण को समाप्त करने में भी सहायक होता है | ब्लैक बोर्ड / व्हाइट बोर्ड का प्रयोग शिक्षण को क्रमबद्ध , व्यवस्थित और सुनियोजित भी बनाता है | अतः शिक्षक को अपने शिक्षण में अधिकाधिक ब्लैक बोर्ड / व्हाइट बोर्ड का प्रयोग करना चाहिए |

ब्लैक बोर्ड / व्हाइट बोर्ड के प्रयोग में शिक्षक को निम्नलिखित बातों का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए –

1-  स्पष्ट , स्वच्छ और सुंदर लेखन होना चाहिए |

2-  अक्षरों का आकार और लिखने क्रम सही होना चाहिए |

3-  मुख्य बिन्दुओं को रेखांकित करना चाहिए |

4-  शब्दों के बीच उचित अंतराल होना चाहिए |

5-  ब्लैक बोर्ड / व्हाइट बोर्ड के सामने खड़े नहीं होना चाहिए |

6-  कक्षा की समाप्ति के बाद ब्लैक बोर्ड / व्हाइट बोर्ड को स्वच्छ करना चाहिए ताकि अगली कक्षा के अध्यापक को ब्लैक बोर्ड / व्हाइट बोर्ड को साफ न करना पड़े |

तकनीक के विकास का प्रतिफल है डिजिटल बोर्ड | हांलाकि ब्लैक बोर्ड / व्हाइट बोर्ड की अपेक्षा महंगा होने के कारण अभी इसकी उपलब्धता कम ही विद्यालयों में है , लेकिन धीरे-धीरे इसका विस्तार हो रहा है और निकट भविष्य में कक्षाओं में ब्लैक बोर्ड / व्हाइट बोर्ड की जगह डिजिटल बोर्ड ही हुआ करेंगे | डिजिटल बोर्ड अधिक उपयोगी , अधिक सुविधाजनक होने के कारण अधिक प्रभावी है | डिजिटल बोर्ड एक तरह का कंप्यूटर है जो ब्लैक बोर्ड / व्हाइट बोर्ड की जगह पर इस्तेमाल किया जाता है | इसका प्रयोग ब्लैक बोर्ड / व्हाइट बोर्ड की तरह लिखने के लिए तो किया ही जा सकता है साथ ही कंप्यूटर के मॉनिटर की तरह इसका प्रयोग सहायक सामग्री के रूप में किया जा सकता है | कंप्यूटर पर होने वाली सभी गतिविधियाँ डिजिटल बोर्ड पर सम्पन्न की जा सकती हैं | इसे इन्टरनेट से कनेक्ट कर इन्टरनेट पर उपलब्ध विभिन्न पाठ्य सामग्रियों , वीडियो आदि को एक्सेस किया जा सकता है | कुल मिलाकर डिजिटल बोर्ड एक बहुआयामी औज़ार है जिससे शिक्षण प्रक्रिया बहुत सरल और प्रभावी बनाई जा सकती है | इससे अध्यापक के समय और श्रम की बचत होती है क्योंकि इस पर सारा काम बहुत त्वरित  गति से होता है | अपनी अन्यान्य खूबियों के साथ इस पर वे सभी काम किए जा सकते हैं जिन्हें अध्यापक ब्लैक बोर्ड / व्हाइट बोर्ड पर करता है |

आधुनिक तकनीकी का माध्यम होने के कारण कुछ पुराने शिक्षक डिजिटल बोर्ड के  इस्तेमाल से दूर भागते हैं | वे इसे झंझट का काम समझते हैं और परंपरागत तरीके से चॉक , डस्टर का प्रयोग करके ही पढ़ाना बेहतर समझते हैं | ये उन शिक्षकों का भ्रम और झिझक भर ही है | एक बार ये झिझक टूट जाये तो डिजिटल बोर्ड का प्रयोग ज्यादा आसान और सुविधाजनक है | हम कई बार अपनी पूर्वधारणाओं से मुक्त नहीं हो पाते हैं और हर नयी चीज का प्रयोग करने से पहले आशंकाओं के भरकर झिझकते हैं | अध्यापकों की यह झिझक टूटनी ही चाहिए | यदि आप समय के साथ अपने को अपडेट नहीं करेंगे तो आप अप्रासंगिक हो जाएँगे | हम अपनी झिझक के चलते संसाधनों के समुचित प्रयोग से विद्यार्थियों को वंचित नहीं कर सकते | पहले मैं खुद डिजिटल बोर्ड के इस्तेमाल से झिझकता था लेकिन अपने कुछ नौजवान शिक्षक साथियों को इसका इस्तेमाल करते देख हिम्मत बढ़ी | धीरे-धीरे सीखा , प्रयास किया और आज मैं विश्वास के साथ कह सकता हूँ मैं अब शिक्षण-कार्य ज्यादा प्रभावी ढंग से कर पा रहा हूँ | अपने संकोच से उबर कर मैं विद्यार्थियों के साथ एक बड़ा अन्याय करने से बच गया | इस विषय में एक आखिरी बात कहना चाहूँगा कि आज की पीढ़ी तकनीकी मामले बहुत तेज है | कंप्यूटर का ज्ञान हमारे विद्यार्थियों को हमसे ज्यादा है तो डिजिटल बोर्ड के इस्तेमाल का तरीका हमें अपने विद्यार्थियों की मदद से सीखना पड़े तो इसमें भी कोई हर्ज नहीं है | आखिर जितना कुछ विद्यार्थी हमसे सीखते हैं उससे कहीं ज्यादा हम भी विद्यार्थियों से सीखते हैं |

अध्यापक की बुलंद एवं प्रभावी आवाज़

 

बुलंद एवं प्रभावी आवाज़

मेरे एक मित्र शिक्षक हैं | अपने विषय मेन बेहद योग्य | पढ़ाते बहुत अच्छा हैं किन्तु मैंने देखा कि उनकी कक्षा में विद्यार्थी रुचि नहीं लेते | पीछे की पंक्ति में बैठे विद्यार्थी या तो कोई दूसरा विषय पढ़ते रहते या आपस में बातचीत करते | बेहद अच्छा शिक्षण करने के बावजूद कक्षा पर उनका नियंत्रण नहीं रहता | उनके विषय का परीक्षा परिणाम भी औसत ही रहता | इसके कारण की जब मैंने गहराई से पड़ताल की तो मेरा निष्कर्ष यह निकला कि कक्षा-शिक्षण के दौरान उनकी आवाज़ बुलंद और प्रभावी नहीं है | वे शिक्षण के दौरान इतने मंद स्वर में बोलते कि उनका कहा पिछली पंक्ति में बैठे विद्यार्थियों को स्पष्ट सुनाई नहीं पड़ता | शायद ही किसी शिक्षक-प्रशिक्षण के दौरान शिक्षक को उसकी आवाज़ के महत्त्व के बारे में बताया जाता हो | अब तक के अपने शिक्षकीय अनुभव के बाद मेरा मानना है कि बुलंद एवं प्रभावी आवाज़ भी अच्छे शिक्षण का एक महत्त्वपूर्ण घटक है | मेरा यह भी मानना है कि अध्यापन के दौरान शिक्षक की आवाज़ को रंगमंच के एक कलाकार की तरह होना चाहिए |

शिक्षक की आवाज़ न तो धीमी होनी चाहिए न ही बहुत तेज़ | आवाज़ इतनी होनी चाहिए कि कक्षा के सभी विद्यार्थियों को अध्यापक की काही बात सुस्पष्ट सुनाई पड़े और समझ मे आए | कई शिक्षक बोलते तो तेज़ हैं मगर इतनी जल्दी बोलते हैं कि क्या कहा गया है समझ में नहीं आता तो कई शिक्षक ऐसा चबा-चबा कर बोलते हैं कि वहाँ भी सुस्पष्ट सम्प्रेषण नहीं हो पाता है | तो आवाज़ सुस्पष्ट और इतनी तेज़ होनी चाहिए कि सबको सुनाई पड़े व समझ में आए | अगर ऐसा नहीं होगा तो विद्यार्थी शिक्षक से ध्यान हटाकर दूसरी शरारतों में लिप्त हो जाएँगे | बुलंद आवाज़ में एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव होता है जो सुनने वाले का ध्यान आकर्षित करती है | इसीलिए आपने देखा होगा कि नेताओं , मोटीवेशनल स्पीकर आदि की आवाज़ दमदार होती है | बुलंद आवाज़ में आत्मविश्वास झलकता है | आत्मविश्वास से भरा शिक्षक विद्यार्थियों को अपने सम्मोहन में बांध सकता है | आत्मविश्वास से भरा शिक्षक ही कक्षा को नियंत्रित कर सकता है | दूसरा महत्त्वपूर्ण पहलू यह है कि शिक्षक की आवाज़ में नाटकीयता होनी चाहिए | यहाँ नाटकीयता का आशय कृतिमता नहीं बल्कि जीवंतता है | शिक्षक को वर्ण्य-विषय के भावानुरूप आरोह-अवरोह के साथ बोलना चाहिए | पाठ में वर्णित भाव उसकी आवाज़ में झलकना चाहिए | इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि विद्यार्थी के लिए शिक्षक को सुनना रुचिकर होता है और वह वर्ण्य-विषय के साथ तादाम्य स्थापित करता है | वह पाठ से पूरी तरह से जुड़ जाता है | यूँ तो भावानुरूप आवाज़ का आरोह-अवरोह सभी शिक्षकों के लिए उपयोगी है किन्तु मानविकी विषय के शिक्षकों में तो यह गुण उनके शिक्षण को कई गुना प्रभावी बना देता है | हर व्यक्ति की अपनी अलग शैली और विशिष्टता होती है इसलिए कहा जा सकता है कि सभी शिक्षकों में यह गुण हो ऐसा ज़रूरी नहीं है | किन्तु मेरा यह स्पष्ट मानना है कि यदि शिक्षण को सफल बनाना है तो इस गुण का धीरे-धीरे विकास हर शिक्षक को करना चाहिए | हाँ , उन कारपोरेट अद्यापकों की बात अलग है जिनकी कक्षा में सैकड़ों विद्यार्थी एक साथ होते हैं और जो शिक्षण के दौरान कालर माइक का इस्तेमाल करते हैं , या जो अध्यापक यूट्यूब पर ऑनलाइन अध्यापन करते हैं , उनकी दुनिया अलग है |  वे चाहें तो मेरी इस बात को हवा में उड़ा सकते हैं |