ये कविता क्यों लिखी मैं खुद नहीं जानता , बस एक दोपहर जाने किस प्रवाह में खुद ब खुद ये सवाल जेहन में उठा , और एक कविता कि शक्ल में तब्दील हो गया . इस सवाल का जवाब हर एक के पास है , होता ही है , पर सिर्फ महसूस करने तक , उसे किसी फार्मूले मे निबद्ध करना , या इसका हिसाब किसी और को बता ले जाना न ही मेरे पास है और शायद न ही आपके पास . तो फिर हाजिर है ये कविता , महसूस करिये .
प्यार में प्यार जोड़ो ,
प्यार में प्यार घटाओ ,
प्यार का प्यार से गुणा करो ,
या फिर प्यार को प्यार से भाग दे दो
हर बार बचता सिर्फ प्यार ही है .
प्यार के गणित का आखिर ये कौन-सा सूत्र है ?
क्या आप जानते है ?
प्यार में प्यार जोड़ो ,
प्यार में प्यार घटाओ ,
प्यार का प्यार से गुणा करो ,
या फिर प्यार को प्यार से भाग दे दो
हर बार बचता सिर्फ प्यार ही है .
प्यार के गणित का आखिर ये कौन-सा सूत्र है ?
क्या आप जानते है ?
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