रविवार, 23 अक्टूबर 2011

सूक्ष्म से सूक्ष्मतर वायविक हो गए

लंबे समय से कुछ लिख नहीं पाया था . एक ब्लाक -सा था लेखन में , इसी ब्लाक को तोड़ने के लिए पहले तो कुछ अछांदस कवितायें लिखीं , पर कुछ जमा नहीं क्योंकि मेरा मन तो छांदस , अनुशासित रचनाओं में ही रमता है . और अगर काम मन का न हो तो आप समझ सकतें हैं कि कैसा महसूस होता है . अब इसी मन की जिद में मैंने जबरदस्ती ही सही ये गज़ल कह डाली है . मै जानता हूँ कि गज़ल का प्रवाह उसकी गज़लियत आमद के शेर में ही अपनी पूरी रंगत में होती है . पर जहां कुछ न हो वहाँ थोड़ा भी होना एक संतोष का सबब तो हो ही सकता है , मुझे तो खुशी इसी बात की है कि व्यवधान टूटा है , उम्मीद है आगे मैं बेहतर गज़लें कह पाउँगा , पूरे आमद के शेरों वाली गज़लें , तगज्जुल से भरपूर . फिलहाल तो इसी जबरदस्ती की गज़ल से काम चलाइए . शुद्ध साहित्यिक हिन्दी के शब्दों को काफिये के रूप में यहाँ मैंने इस्तेमाल किया है , मुझे लगता है कि ये गज़ल के लिए एक नई दिशा की तरफ कदम है , अब ये देखना है कि ये कदम आगे कहाँ तक जाते है .
यूं तो कहने को हम आधुनिक हो गए ,
सुख के दिन जिंदगी में क्षणिक हो गए .
सामना सच का करने लगे हैं सभी ,
'मूल्य' सच के सभी काल्पनिक हो गए .
गांधी ,गौतम के इस देश में जाने क्यों ,
... हर तरफ क्रूर निर्मम वधिक हो गए .
हर तरफ आसुरी वृत्तियाँ हैं यहाँ ,
राम दुर्लभ हैं , रावण अधिक हो गए .
भावनाएं हमारी लगे बेचने ,
चौथे खम्बे सभी अब वणिक हो गए .
जाति में , धर्म में , क्षेत्र में बंट गए ,
हम वृहद थे मगर अब तनिक हो गए .
प्रेम में इस कदर आत्मिक हम हुए ,
सूक्ष्म से सूक्ष्मतर वायविक हो गए .
शब्द की जबसे ताकत मिली 'शम्स ' को ,
वो मुखर हो गए , साहसिक हो गए .
और इसी गज़ल में एक शेर हज़ल का भी गौर फरमाएं -
जब घोटाले में पकड़े गए आप तो ,
दिल की धड़कन बढ़ी और 'सिक ' हो गए .
डा. दिनेश त्रिपाठी 'शम्स'

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें