बुधवार, 25 अक्टूबर 2023

कक्षा-प्रबंधन उर्फ अध्यापक संहिता

 


प्रबंधन का अर्थ है उपलब्ध संसाधनों का दक्षतापूर्वक एवं प्रभावपूर्ण तरीके से उपयोग करते हुए लोगो के कार्यों में समन्वय करना ताकि लक्ष्यों की प्राप्ति सुनिश्चित की जा सके | प्रबंधन के अंतर्गत योजना-निर्माण (planning) , संगठन-निर्माण (organizing) , स्टाफिंग (staffing) , नेतृत्व करना (leading) तथा नियंत्रण करना आदि आते हैं | प्रबंधन इसलिए आवश्यक है कि व्यक्ति सामूहिक उद्देश्यों की पूर्ति में अपना श्रेष्ठतम योगदान दे सके | प्रबंधन के उद्देश्य किसी भी क्रिया के अपेक्षित परिणाम होते हैं |

शैक्षिक जगत में एक शिक्षक को भी अपनी कक्षा का प्रभावी एवं दक्षतापूर्ण प्रबंधन करना होता है | उसे विद्यार्थियों के क्रिया-कलाप एवं गतिविधियों में समन्वय स्थापित करना होता है ताकि विद्यार्थी अधिकाधिक अधिगम के लक्ष्य को प्राप्त कर सकें | शिक्षक को अपने ज्ञान और कौशल का समुचित प्रयोग करना पड़ता है |

कक्षा का प्रबंधन करना शिक्षक के लिए चुनौती भरा कार्य है | शिक्षक का प्राथमिक उद्देश्य विद्यार्थी का पूर्ण विकास करना है | पूर्ण विकास तभी संभव है जब शिक्षक अपने प्रबंधन द्वारा विद्यार्थियों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर सकेगा | आज के दौर में विद्यार्थियों का एकाग्रचित होना कक्षा में ही नहीं जीवन में भी कठिन होता जा रहा है | कक्षा में विद्यार्थियों को अच्छे नतीजे प्राप्त करने , उनके व्यक्तित्व में सकारात्मक बदलाव लाने , पठन-पाठन के प्रति उनकी रुचि जागृत करने के लिए शिक्षक को कक्षा-प्रबंधन के उपाय अपनाने चाहिए | अपने अब तक के अध्यापकीय अनुभव के आधार पर बेहतरीन कक्षा-प्रबंधन हेतु मैं  कुछ सुझाव आपके सामने रख रहा हूँ –

(1)           शिक्षक को कक्षा में एक ही जगह पर स्थिर होकर अध्यापन नहीं करना चाहिए | जिस प्रकार एक रंगकर्मी पूरे स्टेज का भरपूर इस्तेमाल करता है , उसी तरह कक्षा भी एक शिक्षक के लिए रंगमंच से कम नहीं है और कक्षा को जीवन बनाने के लिए उसे गति करते रहना चाहिए | यूँ भी जब गतिविधि आधारित (activity based) शिक्षण होगा , विद्यार्थियों से अधिकाधिक संवाद होगा तो एक ही स्थान पर खड़े रहना संभव नहीं है | कक्षा में गति करते रहने से समस्त विद्यार्थियों की गतिविधियों पर न केवल नज़र रहेगी बल्कि कक्षा को नियंत्रित करने में आसानी होगी |

(2)           कुछ शिक्षक कक्षा में प्रवेश करते ही सीधे अध्यापन शुरू कर देते हैं | यह गलत तरीका है | कक्षा में जाने पर सबसे पहले ब्लैक बोर्ड / व्हाइट बोर्ड पर दिनांक , विषय , पाठ का शीर्षक इत्यादि लिखना चाहिए | इससे विद्यार्थी पिछले कालांश की मनःस्थिति से बाहर आकार आपके विषय पर केन्द्रित हो जाते हैं | ब्लैक बोर्ड / व्हाइट बोर्ड पर लिखा गया पाठ का नाम उन्हें मानसिक रूप से उस पाठ को पढ़ने के लिए तैयार कर देता है | ब्लैक बोर्ड / व्हाइट बोर्ड अधिगम की प्रक्रिया का सबसे महत्त्वपूर्ण औज़ार है | शिक्षण में प्रयुक्त सहायक सामग्रियों में ब्लैक बोर्ड / व्हाइट बोर्ड प्रमुख व अनिवार्य है | शिक्षण के दौरान ब्लैक बोर्ड / व्हाइट बोर्ड का अधिकाधिक प्रयोग होना चाहिए | (ब्लैक बोर्ड /व्हाइट बोर्ड/डिजिटल बोर्ड  के महत्त्व पर अलग से एक अध्याय में विस्तार से चर्चा की गई है| )

(3)           विद्यार्थियों को यह निर्देश दिया जाना चाहिए कि वे शिक्षण के दौरान बताए गए महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं तथा ब्लैक बोर्ड / व्हाइट बोर्ड पर लिखी गई सामग्री को अपनी नोटबुक में उतारते रहें | शिक्षक को अध्यापन के दौरान कक्षा में घूमते हुए इस बात पर नज़र रखनी चाहिए कि सभी विद्यार्थी इस निर्देश का पालन कर रहे हैं या नहीं | शिक्षक सुनिश्चित करें कि सभी विद्यार्थी बताई गई बातों को नोटबुक में नोट करते जा रहे हैं |

(4)           शिक्षण को रुचिकर , सरल बनाने के लिए ज़रूरी है कि अधिकाधिक सहायक सामग्रियों (teaching aids) का इस्तेमाल हो | पढ़ने में विद्यार्थियों की रुचि जगाने के लिए सहायक सामग्रियों का प्रयोग बहुत उपयोगी है | सहायक सामग्री अध्यापक के लिए प्रकरण को अधिक स्पष्ट करके पढ़ाने में सहायक होते हैं | विद्यार्थी भी आसानी से प्रकरण को समझ पाते हैं | चार्ट , नक्शा , ग्लोब , पीरियादिक टेबल आदि विषयानुरूप तरह-तरह की सहायक सामग्रियों का प्रयोग शिक्षक करते हैं | कुछ सहायक सामग्रियाँ बाज़ार में आसानी से उपलब्ध होती हैं , कुछ की व्यवस्था शिक्षक को अपने स्तर से करनी पड़ती है | आजकल कक्षाओं में स्मार्ट बोर्ड आ गए हैं जिनमें इन्टरनेट के माध्यम से सहायक सामग्रियों अपार भंडार मौजूद है | (सहायक सामग्री पर अलग से विस्तारपूर्वक एक अध्याय में चर्चा की गई है )

(5)           शिक्षण कोई एकरेखीय (linear) प्रक्रिया नहीं है | विद्यार्थी शिक्षण-प्रक्रिया का केंद्र है | इसीलिए सभी शिक्षाविद मानते हैं कि शिक्षण को अध्यापक केन्द्रित न होकर विद्यार्थी केन्द्रित होना चाहिए | ज्ञान विद्यार्थियों पर बाहर से थोपा गया न होकर , उनके भीतर से विकसित हो , विद्यार्थी केन्द्रित शिक्षा का यही उद्देश्य है | इसके लिए ज़रूरी है कि शिक्षण-प्रक्रिया में विद्यार्थियों की सर्वाधिक सहभागिता हो | उनकी उत्सुकता को प्रेरित किया जाये , उन्हें प्रश्न पूछने के लिए प्रोत्साहित किया जाये तथा शिक्षक भी उनसे सवाल पूछें और विद्यार्थियों के जवाब के माध्यम से ही पाठ को आगे बढ़ाएँ | यहाँ ध्यान रखने योग्य बात यह है कि अध्यापक कक्षा के कुछ कुशाग्र या सिर्फ अग्रिम पंक्ति के विद्यार्थियों से ही प्रश्न न पूछें बल्कि कक्षा के सभी विद्यार्थियों से प्रश्न पूछें | फिर चाहे वह अग्रिम पंक्ति में बैठा विद्यार्थी हो या पीछे बैठा हुआ विद्यार्थी , वह कुशाग्र विद्यार्थी हो या सपोरटिव लर्नर , बालक हो या बालिका | इससे विद्यार्थियों का कोई भी वर्ग अपने को उपेक्षित महसूस नहीं करेगा | शिक्षण-प्रक्रिया में सहभागी बनने से पढ़ने के प्रति उनकी रुचि तथा एकाग्रता का विकास होगा |

(6)           कक्षा में इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि अध्यापक प्रत्येक विद्यार्थी को हमेशा उसके नाम से संबोधित करें ना कि ओए या सुन कहकर | विद्यार्थी को किसी भी निकनेम या उपहासात्मक विशेषण से भी संबोधित नहीं करना चाहिए | इससे विद्यार्थी स्वयं को अपमानित महसूस करता है | वहीं जब उसका नाम लेकर उससे कोई प्रश्न पूछा जाता है तो उसमें सजगता आती है और वह शिक्षक की बातों को ग़ौर से सुनना शुरू आकर देता है |

(7)           माध्यमिक स्तर के विद्यार्थी अधिकांशतः किशोर वयः के होते हैं , जिनमें भावनात्मक संवेग बहुत ज़्यादा होता है | इस उम्र में छोटी-छोटी बातों से उनके मन में स्थायी ग्रंथि बन जाने का खतरा ज़्यादा रहता है जो उनके पूरे व्यक्तित्व को प्रभाविता कर सकता है | अतः ज़रूरी है कि कक्षा में बच्चे को अपमानित न करें , उससे अनर्गल बात न करें , न ही उसकी किसी अन्य बच्चे से तुलना करें | यह कहकर बच्चे को अपमानित न करें कि तुम्हें कुछ नहीं आता , तुम जीवन में कुछ नहीं कर सकते ....... बल्कि उन्हें विश्वास दिलाइए कि वे सभी इस कक्षा का अभिन्न अंग हैं | उन्हें यह कहकर शर्मिंदा न करें कि तुम क्लास को डिस्टार्ब कर रहे हो या ज़रा पढ़ाई पर ध्यान दो | बच्चे की किसी भी ग़लती के लिए उसे सार्वजनिक रूप से अपमानित करने की बजाय बेहतर होगा उससे अकेले में बात की जाये , उसकी समस्या को जाना जाये और उसकी काउंसिलिंग की जाये |  

(8)           हमारा देश विविधताओं का एक गुलदस्ता है जिसमें तरह-त्राह के फूल अपनी खुशबू बिखेर रहे हैं | यही वैविध्य हमारे देश की खूबसूरती है | विडम्बना यह है कि इसी वैविध्य के चलते हमारा समाज धर्म , जाति , संप्रदाय , भाषा , क्षेत्र , लिंग , रंग आदि के आधार पर आपस में बंटा हुआ है और श्रेष्ठताबोध या हीनताबोध की ग्रंथि पाले हुये है | ये ग्रंथियाँ भेदभाव , नफ़रत , द्वेष , ईर्ष्या को बढ़ाती हैं और सद्भाव का ह्रास करती हैं | यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे कुछ शिक्षक साथी भी इन ग्रंथियों से अछूते नहीं हैं | एक शिक्षक के रूप में हमारा कर्तव्य है कि हम विद्यार्थियों के मन में सभी को समान समझते हुये मानवीय मूल्यों के प्रति प्रेम जगाएँ और उनमें भाषा , धर्म , जाति , रंग , लिंग , संप्रदाय के आधार पर किसी प्रकार का  भेदभाव न पनपने दें | यदि शिक्षक खुद इन ग्रंथियों से ग्रस्त होगा तो विद्यार्थियों को इनसे मुक्त क़ैसे रख सकता है | इन ग्रंथियों के कारण ही शिक्षक विद्यार्थियों से समान व्यवहार नहीं कर पाएगा और अपनी कटुता को किसी न किसी तरह अभिव्यक्त करता रहेगा | इस तरह के कई किस्से हम आए दिन मीडिया में पढ़ते , देखते रहते हैं | कटुता और विद्वेष को झेल रहे विद्यार्थी में भी कटुता और नफरत ही पनपेगी | यह इतना आसान तो नहीं किन्तु अध्यापकीय गरिमा इसी में निहित है कि अध्यापक इन ग्रंथियों से मुक्त रहे |

अब सवाल यह है कि इस बात की कक्षा-प्रबंधन में क्या भूमिका है ? मैं अध्यापक द्वारा कक्षा में किए गए व्यवहार को भी कक्षा-प्रबंधन का हिस्सा मानता हूँ इसलिए यहाँ मैं अपने शिक्षक साथियों से बहुत विनम्र अनुरोध करना चाहूँगा कि उन्हें अपनी कक्षाओं में धर्म , जाति , संप्रदाय , भाषा , क्षेत्र , लिंग , रंग आदि के आधार पर किसी भी तरह की टिप्पणी करने से बचना चाहिए | किसी भी एक वर्ग , समुदाय  को श्रेष्ठ बताने वाले या किसी वर्ग , समुदाय को नीचा दिखाने वाले वक्तव्य का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए | कई बार अध्यापक मज़ाक-मज़ाक में ही लड़के और लड़कियों में तुलना करके अंजाने ही लैंगिक विभेद (gender discrimination) कर बैठते हैं | इसी तरह किसी विद्यार्थी के मोटे-पतले , गोरे-काले होने पर या किसी शारीरिक , मानसिक विकृति होने पर शिक्षक द्वारा की गयी उपहासात्मक टिप्पणी उस विद्यार्थी को आहत कर सकती है | कहना न होगा कि कुछ शिक्षक कक्षा में घृणा से भारी जातीय टिप्पणियाँ करते भी पाये गए हैं | ऐसी बातें विद्यार्थी के कोमल मन पर कितना गहरा घाव करती हैं इसका अंदाज़ा हमें होना चाहिए | यह स्वाभाविक है कि हम जिस वर्ग या समुदाय से होते हैं हमारा झुकाव उस वर्ग या समुदाय की ओर ज्यादा होता है लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है हम अन्य वर्ग या समुदाय के लोगो को हेय समझें और उनके साथ असमान व्यवहार करें | शिक्षक को यह बात भली भांति समझ लेना चाहिए | शिक्षक को कक्षा में अपनी वाणी को संयमित और गरिमापूर्ण रखना ही होगा |

(9)           इसी सिलसिले में अध्यापक की वाणी से संबन्धित एक सुझाव यह भी है कि उसे कक्षा में अभद्र , अश्लील शब्दों व गाली-गलौज के इस्तेमाल से परहेज करना चाहिए यहाँ तक कि हास्य-विनोद में भी सड़क छाप भाषा , निम्न स्तरीय चुटकुलों , पुरानी दक़ियानूसी संकीर्ण सोच से भरी कहावतों का प्रयोग नहीं करना चाहिए | इस बाबत तब और सजगता बरतनी चाहिए जब विद्यालय में सहशिक्षा(coeducation) हो और कक्षा में बालिकायेँ भी उपस्थित हों |

(10)        एक विद्यार्थी सिर्फ औपचारिक शिक्षा ही ग्रहण नहीं करता बल्कि अनौपचारिक रूप से भी अपने शिक्षकों से हर समय कुछ न कुछ सीखता रहता है | शिक्षक का कार्य-व्यवहार , आचरण , चलना-फिरना , बोलना-बात करना , तौर-तरीका , वेषभूषा सब कुछ विद्यार्थी देखता , निरीक्षण करता है और उसके मन पर इसका गहरा प्रभाव पड़ता है | विद्यार्थी शिक्षक की नकल करते हैं | अतः कक्षा मेन शिक्षक की वेषभूषा सुव्यवस्थित होनी चाहिए | साफ-सुथरे कपड़े , कमीज़ इन की हुई , सँवरे बाल और पैरों में जूता होना चाहिए | भद्दे दिखने वाले , चुस्त , अश्लील कपड़े पहनकर कक्षा में नहीं जाना चाहिए | आशय यह है कि अध्यापक को बहुत कैजुअल तरीके से कक्षा में प्रवेश करने से बचना चाहिए | आप भी सोच रहे होंगे कि कपड़ा वगैरह तो निजी पसंद का विषय है , इसका अध्यापन से क्या लेना-देना ? कोई कैसे भी कपड़े पहने इससे किसी को आपत्ति क्यों हो सकती है ? मेरा उद्देश्य किसी की निजी पसंद की स्वतन्त्रता का हनन करना नहीं है | किन्तु कार्य-क्षेत्र पर , जहां सैकड़ों दृष्टियाँ आपका निरीक्षण करती हैं और आपका अनुसरण करती है , वहाँ औपचारिक वेषभूषा में जाना ही ठीक है | अपने घर पर आप कुछ भी पहनने के लिए स्वतंत्र हैं |

औपचारिक वेषभूषा का मनोवैज्ञानिक प्रभाव आपकी कार्यक्षमता पर पड़ता है | आप कल्पना कर सकते हैं चप्पल फ़हम कर किसी फौजी को परेड करते हुए ? नहीं  न ! बिना बूट पहने परेड करते हुए फौजी में चुस्ती-फुर्ती दिखाई ही नहीं पड़ेगी | अनौपचारिक वेश-भूषा आपको आराम और रिलैक्स फील कराती है पर इसके साथ ही आपके काम में भी आराम व रिलैक्सनेस आ जाता है | आप अपने आप को ढीला-ढाला व आलस्य से भरा महसूस करने लगते हैं | ठीक इसके विपरीत औपचारिक वेषभूषा में आप अपने आप को फुरतीला व सक्रिय महसूस करेंगे | विद्यार्थी का गणवेश (uniform) भी एक औपचारिक वेश-भूषा है , जिसे पहनकर वह स्कूल में सक्रिय बना रहता है | अब जब विद्यार्थी अध्यापक को अनौपचारिक वेश-भूषा में देखेगा तो उसका अपना मन भी रिलैक्स होने को करेगा | वह भी अपनी इन शर्ट को बाहर निकाल लेगा और कैजुअल हो जाएगा | मतलब यह कि अध्यापक खुद की सक्रियता को तो प्रभावित करेगा ही धीरे-धीरे उसे देखकर विद्यार्थी की सक्रियता भी घाट जाएगी | औपचारिक वेश-भूषा से कार्य-क्षेत्र में काम करने व सक्रिय बने रहने का माहौल बना रहता है |

(11)        जैसा कि पहले चर्चा कर चुका हूँ कि विद्यार्थी अध्यापक से सिर्फ विषय का ज्ञान ही नहीं लेता बल्कि उनके आचरण-व्यवहार से भी सीखता है | इसलिए शिक्षक को पान , मसाला , गुटखा , बीड़ी , सिगरेट , खैनी , तंबाकू , शराब आदि किसी भी तरह का नशा नहीं करना चाहिए | यह बताने की आवश्यकता नहीं कि नशा शारीरिक व मानसिक दोनों तरह से स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है | यहाँ तक कि नशे की हालत में व्यक्ति सामाजिक-स्वास्थ्य को भी नुकसान पहुंचाता है | शिक्षक को हमारा समाज एक आदर्श की तरह देखता है | अतः शिक्षक से अपेक्षा  की जाती है कि उसका आचरण , उसकी आदतें मर्यादापूर्ण हों | यूँ तो नशा करना ही नहीं चाहिए किन्तु यदि आपको नशे की लत लग गई है और आप इसे छोड़ नहीं पा रहे हैं तो यह आपका निजी मामला है | कानून के दायरे में रहकर आप अपने घर पर कुछ भी करने के लिए स्वतंत्र हैं फिर वह नशा ही क्यों न हो | किन्तु विद्यालय विद्या का मंदिर है वहाँ की शुचिता को नष्ट करने का अधिकार किसी को नहीं है | अतः स्पष्ट तौर पर शिक्षक का विद्यालय परिसर में नशा करना वर्जित है | भारत सरकार का सीसीएस कंडक्ट रूल भी इसकी मनाही करता है और इसे दंडनीय अपराध मानता है |  नशा करके कक्षा में जाना तो बिलकुल अक्षम्य है | कुछ  शिक्षक पान , गुटखा , खैनी खाकर कक्षा में चले जाते हैं , उनके लिए ईश्वर से यही प्रार्थना है कि ईश्वर उंकेन सदविवेक दें | विद्यार्थियों के सम्मुख नशा करने वाला शिक्षक परोक्षतः विद्यार्थियों को भी नशे की लत के लिए प्रेरित कर रहा होता है | अध्यापक की इन आदतों को हर विद्यार्थी भले न सीखे पर विद्यार्थी के मन में अध्यापक के लिए सम्मान तो ज़रूर घटता है |

उपरोक्त बिन्दु कक्षा-प्रबंधन का हिस्सा तो हैं ही मैं इन्हें अध्यापक-संहिता (teacher-manual) भी मानता हूँ | ये शिक्षक-जीवन का वो संविधान है जिसका पालन करके एक शिक्षक अपने शिक्षकीय दायित्व से खुद संतुष्ट हो सकता है और अपने विद्यार्थियों को भी संतुष्ट कर सकता है |

अध्यापक यानी जीवन भर विद्यार्थी

 


सीखना एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है  | व्यक्ति अपने जन्म से लेकर मृत्यु तक कुछ न कुछ सीखता ही रहता है | औपचारिक शिक्षा के अतिरिक्त  वह अपने परिवार अपने परिवेश , अपने कार्यस्थल हर जगह से कुछ न कुछ सीखता है | उसका यही सीखना उसके अनुभव और उसकी क्षमताओं को समृद्ध करता है | शिक्षक भी इसका अपवाद नहीं है | किन्तु यह विडम्बना ही है कि एक विषय अध्यापक के रूप में हमारे अधिकतर शिक्षकों की पढ़ने और सीखने की प्रवृत्ति सिर्फ़ नौकरी लगने तक ही जारी रहती है | पठन-पाठन से उनके जुड़ाव का एक मात्र उद्देश्य नौकरी हासिल करना होता है और नौकरी लगते ही उनकी पढ़ने की आदत धीरे-धीरे खत्म होती जाती है | साल-दर-साल निर्धारित पाठ्यक्रम को पढ़ाने के अतिरिक्त अपने विषय में हो रहे नित नए शोध , स्थापनाओं , विचारों , अद्यतन गतिविधियों एवं शिक्षण-प्रविधियों में आ रहे नए-नए बदलाव की उन्हें कुछ जानकारी नहीं होती | उनका शिक्षण कार्य एक ढर्रे पर एक जैसा चलता रहता है | ऐसे शिक्षकों में न तो खुद नया जानने की उत्सुकता शेष बचती है और न ही वे अपने विद्यार्थियों की जिज्ञासु वृत्ति को प्रेरित कर पाते हैं | नौकरी चल रही है , तनख़्वाह मिल रही है और परंपरागत तरीके से एक ढर्रे पर शिक्षण कार्य करते हुये सत्र गुजरते चले जाते हैं | एक शिक्षक के रूप में अपने शैक्षणिक दायित्वों के प्रति उदासीनता की प्रवृत्ति अधिकांश सरकारी शिक्षकों में देखने को मिलती है | वे अपने  अधिकांश समय और ऊर्जा को उन कार्यों में खर्च करते हैं जिनका शिक्षण से कोई लेना देना नहीं होता |

मेरे अनुभव में ऐसे कई उदाहरण हैं कि टीजीटी (एलटी ग्रेड) स्तर के अध्यापक जो जूनियर कक्षाओं को पढ़ाते हैं , माध्यमिक स्तर की कक्षाओं को पढ़ाने में असफल सिद्ध होते हैं | यदि उनसे कभी किसी माध्यमिक स्तर की कक्षा को पढ़ाने का अनुरोध कर दिया जाये तो उनकी क्षमता जवाब देने लगती है | भले ही उनका पद माध्यमिक स्तर की कक्षा को पढ़ाने के लिए न हो , फिर भी किन्हीं परिस्थितियों में कभी पढ़ाना ही पड़ जाये तो वहाँ उन्हें असमर्थ नहीं सिद्ध होना चाहिए क्योंकि उन्होने भी  उस  विषय में कम-अज-कम स्नातक किया हुआ होता है और बहुत से टीजीटी तो उस विषय में परास्नातक भी होते हैं , किन्तु वास्तविकता में ऐसा नहीं होता | कारण स्पष्ट है कि अपने विषय में पढ़ाई जा रही कक्षाओं के निर्धारित पाठ्यक्रम को छोडकर बाकी ज्ञान से धीरे-धीरे उनका नाता छूटता चला जाता है | वे जिन कक्षाओं में पढ़ाते हैं , वहाँ भी किसी नवाचार और गहराई में जाकर विद्यार्थियों को पाठ्यक्रम के अलावा अतिरिक्त ज्ञान देने की संभावना शून्य हो जाती है जिससे विद्यार्थियों की जिज्ञासा को उद्देलित किया जा सके | यही हाल कमोबेश परास्नातक शिक्षकों का भी होता है |

तकनीकी का विकास जिस तेजी से हुआ है संचार और संवाद के माध्यमों में क्रांतिकारी बदलाव आए हैं जिनका प्रभाव शिक्षा जगत पर भी पड़ा है | आज का विद्यार्थी विषय ज्ञान के लिए सिर्फ कक्षा-शिक्षक पर निर्भर नहीं है | स्मार्ट फोन की सस्ती और सहज उपलब्धता तथा सोशल मीडिया की व्यापकता  ने विद्यार्थी के सामने इन्टरनेट के ज्ञान के विराट संसार में प्रवेश करने के कई-कई द्वार खोल दिये हैं | यू ट्यूब और दूसरे  ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर वह किसी भी विषय में देश ही नहीं दुनिया के श्रेष्ठतम अध्यापको से पढ़ सकता है  | यह स्थिति जहां विद्यार्थियों के लिए सुखद है वहीं उन अध्यापकों के लिए चुनौतीपूर्ण है जो समय के साथ चलना नहीं चाहते | यह सच्चाई है कि हमारे तमाम वरिष्ठ अध्यापक तकनीक में पारंगत नहीं हैं | वे सदा परंपरागत ढंग से ही शिक्षण करते रहना चाहते हैं | मैं ऐसे तमाम शिक्षकों को जानता हूँ जो अच्छी तरह स्मार्टफोन संचालित करना भी नहीं जानते | इस मामले में युवा शिक्षक बेहतर हैं | इक्कीसवी सदी का विद्यार्थी बहुत स्मार्ट है , उसे पारंपरिक तरीके के शिक्षण से प्रभावित नहीं किया जा सकता | शिक्षक के सामने चुनौती है अपनी प्रासंगिकता को सिद्ध करने की | विद्यार्थियों के सामने सीखने के जो आधुनिक विकल्प मौजूद हैं , अध्यापक जब तक खुद को उसी तरह आधुनिक और बेहतर सिद्ध नहीं करेगा तब तक वह विद्यार्थी से सम्मान और  जुड़ाव नहीं पा सकता | यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि ऑनलाइन माध्यमों से विद्यार्थी विषय का अच्छे से अच्छा ज्ञान प्राप्त कर सकता है किन्तु उसकी समवेदनाओं का विकास नहीं हो सकता | कक्षा शिक्षण के दौरान विद्यार्थी का अपने सहपाठियों , अपने शिक्षकों से एक संबंध बनता है , उसके जीवन में कुछ खट्टे-मीठे अनुभव जुड़ते हैं , जो बाद में उसकी स्मृतियों की धरोहर बनते हैं | कक्षा-शिक्षण के दौरान विद्यार्थी की सामाजिकता विकसित होती है | कक्षा-शिक्षण में शिक्षक सिर्फ विषय ज्ञान ही नहीं देता बल्कि विद्यार्थी के अंदर नैतिक मूल्यों का विकास भी करता है | अतः एक अध्यापक का अपनी भूमिका से भागना उचित नहीं |

जरूरी है कि विद्यार्थी के साथ-साथ शिक्षक भी हमेशा विद्यार्थी बना रहे | सीखने की कोई उम्र नहीं होती | नई तकनीक को सीखना इतना कठिन भी नहीं | अध्यापकों को चाहिए की वह विद्यार्थियों की अपेक्षाओं पर खरे उतरने के लिए अपनी शिक्षण-प्रविधियों को स्मार्ट बनाएँ | शिक्षण में कंप्यूटर का इस्तेमाल करें | पावर प्वाइंट के माध्यम से पढ़ाएँ , और दूसरी तकनीकों का भी इस्तेमाल करें | इससे शिक्षण रोचक बनेगा जो विद्यार्थियों को आकर्षित करने में सक्षम होगा | इन नयी तकनीकों को सीखने , पाठ्य-सामग्रियों के निर्माण में यदि विद्यार्थियों का ही सहयोग लिया जाये तो कोई गुरेज नहीं क्योंकि इस मामले में वे हम शिक्षकों से ज्यादा पारंगत हैं | अपने कौशल को अपडेट करने के लिए अपने विद्यार्थियों से भी कुछ सीखना पड़े तो इसमें शर्म की कोई बात नहीं होनी चाहिए | आपका शिक्षण ऐसा होना चाहिए कि विद्यार्थी को आपकी आवश्यकता महसूस हो | उसे यू ट्यूब चैनलों और अन्य ऑनलाइन कक्षाओं से ज्यादा लाभप्रद आपकी कक्षा में उपस्थित रहना लगे तभी एक शिक्षक के रूप में आप अपनी प्रासंगिकता बना पाएंगे |

शिक्षक साथियों को चाहिए कि वे अध्ययन से अपना नाता तोड़ें नहीं | जिस भी माध्यम से हो अपने विषय से संबन्धित अद्यतन गतिविधियों की जानकारी रखें | देश-दुनिया में होने वाली तमाम गतिविधियों पर सजग और तार्किक दृष्टि रखें | जो व्यसाय आपकी आजीविका का साधन है उस व्यवसाय में अपने को बेहतर बनाए रखने के लिए कुछ धनराशि खर्च भी करनी पड़े तो कोई हर्ज नहीं है | अपने विषय से संबन्धित पत्र-पत्रिकाओं , जर्नल , शोध-पत्रों और नवीन पुस्तकों को मंगाए और उन्हें पढ़ें |

रविवार, 22 अक्टूबर 2023

कैसे करें सपोर्टिव लर्नर को सपोर्ट

 कैसे करें सपोर्टिव लर्नर को सपोर्ट

डॉ दिनेश त्रिपाठी 

एक शिक्षक के लिए सबसे बड़ी चुनौती होती है कमजोर विद्यार्थियों के स्तर को सुधारना | कक्षा शिक्षण के दौरान अध्यापक सभी विद्यार्थियों को एक साथ पढ़ाता है जिसमें कुशाग्र एवं औसत विद्यार्थियों का अधिगम तो हो जाता है , किन्तु कमजोर विद्यार्थियों का अधिगम नहीं हो पाता | परिणामतः पठन-पाठन में उनकी अभिरुचि घटती जाती है , परीक्षा में उनका प्रदर्शन खराब होता है और वे अनुत्तीर्ण हो जाते हैं | यूँ परीक्षा के प्राप्तांक ही किसी विद्यार्थी की योग्यता का पैमाना नहीं है किन्तु औपचारिक शिक्षा में पारंपरिक रूप से विद्यार्थी के अधिगम का मूल्यांकन प्राप्तांक से ही  होता आया है और आज भी परीक्षा के प्राप्तांकों के आधार पर ही अधिगम का मूल्यांकन किया जाता है |  सभी शैक्षणिक संस्थाओं का प्रथम लक्ष्य होता है वहाँ पंजीकृत शत-प्रतिशत विद्यार्थियों का उत्तीर्ण होना | यानी क्वालिटी रिजल्ट तो चाहिए मगर उससे भी पहले क्वान्टिटी रिजल्ट | कोई शैक्षणिक संस्थान नहीं चाहता कि उसके यहाँ पढ़ने वाले विद्यार्थी अनुत्तीर्ण हों | शिक्षक की योग्यता का आकलन भी उसके द्वारा पढ़ाये गए विद्यार्थियों के उत्तीर्ण प्रतिशत से ही किया जाता है | इसलिए हर शिक्षक का उद्देश्य कम अज़ कम हर विद्यार्थी को पास करा देने का ज़रूर रहता है | कमजोर विद्यार्थियों के शैक्षणिक प्रदर्शन को सुधारने के लिए तमाम तरीके अपनाए जाते हैं | इस मुद्दे पर सैद्धान्तिक रूप से तमाम आलेख , पुस्तकें आदि मिल जाएंगी | बीएड के पाठ्यक्रम में भी इस मुद्दे पर अध्याय होंगे ही , किन्तु मेरा उद्देश्य अब तक के अपने अध्यापकीय अनुभव के आधार पर व्यावहारिक सुझाव देना है और मेरा पूर्ण विश्वास है कि इन सुझावों का अनुसरण कर मेरे साथी शिक्षक काफी हद तक सफलता प्राप्त कर सकते हैं | 

 कमजोर विद्यार्थियों के अधिगम स्तर को सुधारने का सबसे पहला और महत्त्वपूर्ण मंत्र तो यही है कि उन्हें न तो कमजोर माना जाये और न ही कहा जाये | कमजोर विद्यार्थियों को कमजोर कहने से उनमें हीन भावना उत्पन्न होती है और जिसके कारण उनका आत्मविश्वास दिनो-दिन घटता जाता है | परिणामतः वह मान बैठता है कि उसके बस का नहीं है | एक शिक्षक के रूप में हमारा दायित्व है कि हम विद्यार्थी के आत्मविश्वास को बढ़ाएँ | पूर्व में शिक्षाविदों द्वारा कमजोर विद्यार्थियों को रेमेडियल स्टूडेंट (उपचारात्मक विद्यार्थी ) कहा जाता था अर्थात जिन्हें शैक्षणिक उपचार की आवश्यकता है | फिर उन्हें स्लो लर्नर और लो एचीवर की संज्ञा दी गई | आजकल कमजोर विद्यार्थियों को सपोर्टिव लर्नर कहा जाना ज़्यादा उपयुक्त माना जाता है | इन बदलाव के पीछे मूल मंशा सिर्फ यही है कि विद्यार्थी को उसके कमजोर होने का एहसास न कराया जाये | शिक्षक हमेशा ऐसे विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करें कि यह तुम कर सकते हो , यह तुमसे संभव है , तुम भी अच्छे अंक  ला सकते हो | 

 मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि बच्चे बड़ों की अपेक्षा अपने हम उम्र दोस्तो से अधिक सीखते हैं क्योंकि वे उनके साथ ज़्यादा सहज होते हैं | अध्यापकों को विद्यार्थियों की इस स्वाभाविक मनोवृत्ति का फायदा उठाते हुये कक्षा में उनके छोटे-छोटे समूह निर्मित करने चाहिए | प्रत्येक समूह में एक मेधावी विद्यार्थी ( high achiever ) , एक औसत विद्यार्थी ( average achiever ) तथा एक कमजोर विद्यार्थी ( supportive learner ) को सम्मिलित किया जाना चाहिए | कमजोर विद्यार्थी दिये गए एसाइनमेंट को पूरा करने की प्रक्रिया में अपने सहपाठी से सहजता से सीखता जाता है | 

 कक्षा-शिक्षण के दौरान कक्षा में सभी स्तर के विद्यार्थी मौजूद होते हैं | इसलिए वहाँ अलग-अलग स्तर के विद्यार्थियों के लिए अलग-अलग शिक्षण-पद्धति ( teaching mathedology) का इस्तेमाल कर पाना शिक्षक के लिए संभव नहीं होता  है | शिक्षक को समय से पाठ्यक्रम भी पूरा करना होता है | जैसा कि पहले चर्चा की जा चुकी है कि कक्षा-शिक्षण के दौरान मेधावी विद्यार्थी एवं औसत विद्यार्थी तो विषयवस्तु को आसानी से समझ जाते हैं , किन्तु कमजोर विद्यार्थी विषयवस्तु को पूरी तरह समझ नहीं पाते | सहपाठियों के बीच मज़ाक का पात्र बन जाने के डर से वे बढ़-चढ़ कर अध्यापक से सवाल भी नहीं पूछते | जिस वजह से उनकी शंकाओं का समाधान भी नहीं हो पाता | जब उनकी समझ में नहीं आता तो पढ़ने के प्रति उनकी रुचि घटने लगती है और वे तरह-तरह की शरारती गतिविधियों में लिप्त होने लगते हैं | अध्यापकों को कमजोर विद्यार्थियों की अलग से अतिरिक्त कक्षाएं ( extra classes ) लेनी चाहिये | अध्यापकीय कर्तव्य को कार्य के घंटों से नापने वाले शिक्षकों के लिए अतिरिक्त कक्षाएं लेना अतिरिक्त भार ही लगेगा किन्तु विद्यार्थी की उपलब्धियों से अध्यापकीय कर्तव्य का मूल्यांकन करने वाले शिक्षक सहर्ष अतिरिक्त कक्षाएं लेंगे | अध्यापक को इन अतिरिक्त कक्षाओं में पाठ का अध्यापन अधिकाधिक सरल व सहज ढंग से करने का प्रयास करना चाहिए | इसके लिए शिक्षक को चाहिए कि वह , कमजोर विद्यार्थियों के स्तर को ध्यान में रखते हुये , किस पाठ को किस प्रविधि ( mathedology ) से पढ़ाना है इसका निर्णय सोच-विचार करके पढ़ाने से पहले ही कर ले | 

 विद्यार्थियों के लिए हर पाठ की कठिनाई का स्तर अलग-अलग होता है | शिक्षा बोर्ड भी इस बात को स्वीकार करते हैं | शिक्षा बोर्डों द्वारा प्रश्न-पत्रों का जो प्रारूप तैयार किया जाता है उसमें लगभग 75 प्रतिशत भारांक सरल पाठों का होता है | सिर्फ 25 प्रतिशत भारांक उन पाठों का होता है जो विद्यार्थियों के लिए अधिगम की दृष्टि से कठिन होते हैं | शिक्षा-बोर्डों द्वारा निर्धारित प्रश्न-पत्र के प्रारूप में यह भी पूर्व-नियोजित होता है कि किस पाठ से कितने अंक के तथा किस प्रकृति (अति लघु उत्तरीय , लघु उत्तरीय , निबंधात्मक , वस्तुनिष्ठ , बहुविकल्पी , आत्मनिष्ठ ) के प्रश्न पूछे जाएँगे | सामान्यतः होता यह है कि अध्यापक शिक्षा-बोर्डों द्वारा निर्धारित प्रश्न-पत्र के प्रारूप में प्रत्येक पाठ के भारांक व प्रश्नों की प्रकृति को जाने बगैर अपनी सारी ऊर्जा व कौशल कमजोर विद्यार्थियों को उस पाठ को पढ़ाने-समझाने में लगा देते हैं जो अपेक्षाकृत कठिन हैं | इसी तरह कमजोर विद्यार्थी भी अपना अधिकांश समय और ऊर्जा उन्हीं कठिन पाठों को समझने की कोशिश में नष्ट कर देते हैं | इस चक्कर में अपेक्षाकृत सरल पाठों की तैयारी तो उनसे छूटती ही है , कठिन पाठों के प्रति भी उनका कन्फ़्यूजन बना रह जाता है जिससे दिन- प्रतिदिन उनका आत्मविश्वास गिरता चला जाता है और अंततः परीक्षा में उनका परिणाम निराशाजनक आता है | शिक्षकों को चाहिए की सबसे पहले बोर्ड द्वारा निर्धारित प्रश्न-पत्र के प्रारूप और प्रत्येक पाठ के भारांक को अच्छी तरह जान लें फिर विद्यार्थियों को भी प्रश्न-पत्र के प्रारूप से अवगत कराएं , प्रश्न-पत्र में आने वाले हर प्रकृति के प्रश्नों से अवगत कराएं   | तत्पश्चात कमजोर विद्यार्थियों से उन्हीं पाठों का अधिकाधिक अभ्यास करवाएँ जो अपेक्षाकृत आसान हैं | जब कमजोर विद्यार्थी सरल अंशों की अधिकाधिक तैयारी करेगा , उनसे पूछे गए प्रश्नों को आसानी से हल कर लेगा तो उसका आत्मविश्वास बढ़ेगा और वह अपनी हीन  भावना से उबरेगा | चूंकि पाठ्यक्रम के सरल अंशों का प्रश्न-पत्र में भारांक अधिक होता है , तो कमजोर विद्यार्थियों के लिए भी संतोषजनक अंकों के साथ परीक्षा में उत्तीर्ण होना मुश्किल नहीं रहेगा | कारण स्पष्ट है कि उसने अपने समय और ऊर्जा का उपयोग अपनी क्षमता को आँकते हुये सही दिशा में किया | 

 कमजोर विद्यार्थी प्रश्न-पत्र देखकर ही भयभीत हो जाते हैं | परीक्षा के नाम से ही उन्हें कंपकंपी छूटने लगती है | उन्हें अपनी क्षमताओं पर भरोसा नहीं रहता | इसलिए शिक्षक का ये भी महत्त्वपूर्ण दायित्व है कि विद्यार्थी के इस भय ( exam fear ) को दूर किया जाये और उसे उसकी क्षमताओं पर यकीन करना सिखाया जाये | इसका सबसे अच्छा तरीका है कि विद्यार्थी से पूरे प्रश्न-पत्र को हल करने का अभ्यास करवाने की बजाय शुरुआत छोटे-छोटे स्लिप टेस्ट से की जाये | विद्यार्थी को क्रमशः एक-एक पाठ से सिर्फ दो-तीन प्रश्नों के उत्तर अच्छी तरह से समझाएँ , उन उत्तरों को अच्छी तरह से तैयार करने के निर्देश दें और फिर उन्हीं प्रश्नों को हल करके दिखाने को कहें | यह क्रम क्रमशः प्रत्येक पाठ से नियमित चलते रहना चाहिए | छोटे-छोटे परीक्षण में सफल होने पर न केवल विद्यार्थी का मनोबल और आत्मविश्वास बढ़ता है बल्कि वह तीन घंटे के पूरे प्रश्न-पत्र का सामना करने के लिए भी तैयार होता चला जाता है |

 कमजोर विद्यार्थियों के प्रदर्शन को सुधारने के लिए किए जाने वाले प्रयासों में उत्तर-पुस्तिकाओं के मूल्यांकन की अहम भूमिका है | शिक्षक को कमजोर विद्यार्थियों की उत्तर-पुस्तिकाओं को उनके सामने ही जाँचना चाहिए | उत्तर-पुस्तकाओं को जाँचते हुये विद्यार्थी को बताया जाये कि अंक किसलिए काटे गए तथा उन्हें सही उत्तर से भी अवगत कराया जाये | परीक्षा की उत्तर-पुस्तिका के साथ-साथ विद्यार्थी की कक्षा नोट-बुक भी इसी सजगता के साथ उसके सामने ही जाँची जाये | ऐसा करने से धीरे-धीरे विद्यार्थी की गलतियाँ कम होती जाएंगी | यदि संभव हो तो सिर्फ कमजोर विद्यार्थी ही नहीं सभी विद्यार्थियों की उत्तर-पुस्तिकाएँ और क्लास नोट-बुक इसी तरह जाँची जाएँ | 

 उपचार के लिए सही निदान ( dignose) होना ज़रूरी है | अगर निदान सही नहीं हुआ तो सारा उपचार व्यर्थ होता जाएगा | एक शिक्षक के लिए सपोर्टिव लर्नर की कमजोरियों की पहचान करना बहुत जरूरी है | यह पता लगाना अत्यावश्यक है कि पाठ्यक्रम के कौन से हिस्से हैं जिनके अधिगम में विद्यार्थी कठिनाई महसूस करता है तथा परीक्षा में विद्यार्थी किस प्रकार की गलतियाँ कर रहा है | कमजोरी के बिन्दुओं की जांच की प्रविधि बहुआयामी है | शिक्षक का अनुभव , बाल मनोविज्ञान की उसकी समझ तथा विषय की गहराई आदि कई बातें हैं जिनके आधार पर शिक्षक पाठ्यक्रम के उन क्षेत्रों की पहचान करता है जिनमें विद्यार्थी कमजोर है | चूंकि इस आलेख का उद्देश्य परीक्षा में विद्यार्थी के प्रदर्शन को बेहतर बनाने के लिए किए जाने वाले उपायों की चर्चा करना है , इस लिहाज से निदान का जो सबसे महत्त्वपूर्ण तरीका है , वह है परीक्षा के उपरांत सपोर्टिव लर्नर की उत्तर-पुस्तिका की प्रश्नवार समीक्षा करना ( questionwise analysis ) | इसके लिए किसी विषय में  सपोर्टिव लर्नर के प्राप्तांकों का प्रश्नवार एक चार्ट निर्मित किया जाता है | चार्ट का नमूना इस प्रकार है –

      

क्रम संख्या 

विद्यार्थी का नाम 

प्रश्न-1

प्रश्न-2

प्रश्न- 3 

प्रश्न- 4 

प्रश्न- 5 

प्रश्न- 6 

प्रश्न- 6 

प्रश्न- 7 




पूर्णांक















प्राप्तांक
























   

     उक्त चार्ट के आधार पर शिक्षक को एक नज़र में पता चल जाएगा कि किस प्रश्न में सर्वाधिक विद्यार्थियों ने कम अंक प्राप्त किए हैं तथा किस प्रश्न में सर्वाधिक विद्यार्थियों ने अधिक अंक प्राप्त किए हैं | ये चार्ट व्यक्तिगत स्तर पर अलग-अलग विद्यार्थियों तथा सामूहिक स्तर पर पूरी कक्षा के प्रश्नवार प्रदर्शन के विश्लेषण में उपयोगी होता है | यह विश्लेषण शिक्षकों की मदद करता है कि आगे के शिक्षण में उन्हें किन बिन्दुओं पर ज्यादा फोकस करना है , शिक्षण प्रविधि में किस तरह के बदलाव करने हैं और विद्यार्थियों को किन बिन्दुओं पर ज्यादा अभ्यास कराने की आवश्यकता है | हर बार प्रश्न-पत्र मे प्रश्नों की संख्या  और अपनी ज़रूरत के हिसाब से अध्यापक  इस चार्ट में बदलाव भी कर सकते हैं | 

(8)- कई बार अच्छे मेधावी विद्यार्थी का प्रदर्शन भी परीक्षाओं में खराब रहता है और उनकी गणना उपचारात्मक विद्यार्थी के रूप में हो जाती है | अध्यापक का दायित्व है कि ऐसे विद्यार्थियों की पहचान भी सुनिश्चित करें और उनके खराब प्रदर्शन के कारणों की तह में जाने की कोशिश करें | ऐसे विद्यार्थियों का मन भावनात्मक उथल-पुथल , डिप्रेशन आदि के कारण पढ़ाई से मन उचट जाता है और उनका प्रदर्शन खराब होने लगता है | पारिवारिक समस्या , किशोरावस्था की समस्या , कोई बीमारी , प्रेम-संबंध , रैगिंग , सहपाठियों की ओर से समस्या या ऐसी अन्य कई वजहें हो सकती हैं जिनके कारण विद्यार्थी मानसिक रूप से विचलित रहता है और अपने आपको पढ़ाई पर केन्द्रित नहीं कर पाता | अध्यापक को चाहिए कि ऐसे विद्यार्थियों से बात करें , उनका विश्वास अर्जित करें , उनकी समस्या की तह तक जाने की कोशिश करें , उनकी काउंसिलिंग , करें उन्हें समझाने का प्रयास करें | आवश्यकता पड़ने पर प्रोफेशनल काउन्सलर की मदद भी ली जा सकती है | निरंतर प्रयास से इस विचलन से भी विद्यार्थी को उबारा जा सकता है |

डॉ दिनेश त्रिपाठी 

जवाहर नवोदय विद्यालय 

ग्राम- अदलबारी , निकासी रोड , मुशलपुर , 

ज़िला – बक्सा -781372 , असम 

मोबाइल – 9559304131 

ईमेल- yogishams@yahoo.com